मौतें, जिन्हें सरकार नहीं मानती
जनवरी 2019 में बीबीसी ने किशनलाल की पत्नी इंदु देवी से मुलाकात की थी. वह अपने तीन बच्चों के साथ तिमारपुर की झुग्गी में बैठी थीं. इस परिवार में कमाई का इकलौता ज़रिया रहे किशनलाल की नाले की सफ़ाई के दौरान मौत हो गई. परिवार वालों का कहना था कि सफ़ाई के वक्त उन्हें बांस का डंडा तक नहीं दिया गया था.
एक सरकारी रिपोर्ट बताती है 23 नवंबर, 2019 को अशोक नाम के एक सफ़ाईकर्मी की ज़हरीली गैस के कारण दम घुटने से हो गई थी. अशोक दिल्ली के शकुरपुर में एक सीवर की सफ़ाई कर रहे थे.
26 जून, 2019 को हरियाणा के रोहतक में सीवर की सफ़ाई करते हुए चार सफ़ाई कर्मियों की मौत हो गई थी.
28 अगस्त 2019 को उत्तर प्रदेश के मथुरा में चार सफ़ाई कर्मियों की मौत सीवर की सफ़ाई करने के दौरान हो गई थी.
फरवरी 2020 में 24 साल के रवि की मौत 15 फ़ीट गहरे सीवर को साफ़ करते वक़्त हुई थी. दिल्ली के शाहदरा इलाके में रवि और 35 साल के संजय को सीवर की सफ़ाई का काम मिला था लेकिन इस दौरान ही रवि की जहरीली गैस से दम घुटने के कारण मौत हो गई. संजय को वक्त रहते अस्पताल पहुंचाया गया तो उनकी जान किसी तरह बची.
मार्च 2021 में दिल्ली के गाज़ीपुर में एंपरर बैन्केवेट हॉल के सीवर की सफ़ाई का काम 1500 रुपये में लोकेश और प्रेम चंद को दिया गया था लेकिन इन दोनों की मौत सीवर में दम घुटने से हो गई.
28 मई 2021, को 21 साल के एक सफ़ाई कर्मी की मौत हो गई क्योंकि उन्हें बिना किसी सुरक्षा गियर के ही ठेकेदार ने सीवर में उतार दिया था.
ये वो कुछ नाम हैं जिनकी मौत सीवर में अंदर जाकर सफ़ाई करने के कारण हुई. इस तरह मरने वालों की लिस्ट लंबी है, लेकिन सरकारी दस्तावेज़ों में इन लोगों के लिए कोई जगह नहीं है.
इनके नाम तो क्या सरकार इनकी संख्या का भी हिसाब नहीं रखती. केंद्र सरकार मानती है कि इनमें से किसी की भी मौत हाथों से मैला ढोने या सीवर साफ़ करने से नहीं हुई.
देश में लगातार बढ़ रही है मैनुअल स्केवेंजिंग
राज्यसभा में एक सवाल के जवाब के दौरान ही सामाजिक न्याय मंत्रालय ने बताया है कि देश में वर्तमान समय में 66 हज़ार से ज़्यादा सफ़ाईकर्मी हैं जो हाथों से मैला साफ़ करते हैं.
साल 2019 में आई नीति आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ साल 2013 में जब मैनुअल स्केवेंजिंग रोकने के लिए क़ानून लाया गया था तो उस वक्त देश में 14 हज़ार से अधिक ऐसे सफ़ाईकर्मी थे जिन्हें मैनुअल स्केवेंजर की श्रेणी में रखा गया था.
साल 2018 के सर्वे में ये संख्या बढ़कर 39 हज़ार पार कर गई और साल 2019 में ये बढ़ कर 54 हज़ार से ऊपर हो गई. अब ऐसे लोगों की संख्या 66 हज़ार से अधिक है.
इस वक्त हाथों से मैला ढोने वाले सबसे ज़्यादा लोग उत्तर प्रदेश में हैं जहां इनकी संख्या 37 हज़ार से ज्यादा है. वहीं 7300 के साथ महाराष्ट्र दूसरे नंबर पर है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ छत्तीसगढ़ इस सूची में सबसे नीचे हैं जहां सिर्फ तीन लोग मैनुअल स्केवेंजर के तौर पर गिने गए हैं.

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