कहां से मोती बनाने की मिली प्रेरणा

 



इलाहाबाद स्टेशन पर एएच व्हीलर की दुकान पर संयोग से उन्हें नेशनल ज्योग्राफ़िक का पुराना अंक मिल गया, जो कल्चर मोती निर्माण के बारे में जानकारी पर आधारित विशेषांक था. सोनकर ने उसे ना केवल ख़रीदा बल्कि आज तक संभाल कर रखा है.

इन सबके साथ अपने तालाब के सीपों के साथ उन्होंने अपनी समझ से प्रयोग करना शुरू कर दिया. सीपों को पकड़ कर बड़े-बड़े बर्तनों में रखना और उसे टकटकी लगाए देखना, सोनकर का शगल बन गया था. मिडिल क्लास समाज में यह काम इतना भी आसान नहीं था.

जल्दी ही उन्हें पता चल गया कि ये सीप सांस लेने के लिए मुंह खोलते हैं और ये भी मालूम था कि कोई बाहरी चीज़ के अंदर जाने पर वह मोती बन सकता है. उन्होंने बताया, "जब मैंने पढ़ना शुरू किया तो मुझे पता चला कि दुनिया भर में मोती उगाने वाली तकनीक केवल जापान के पास थी, वे दूसरे देशों को बताते नहीं थे. और बेहतर मोती बनाने के लिए जो रॉ मैटेरियल यानी न्यूक्लियस इंजेक्ट करना पड़ता है वो अमेरिका के मिसीसिपी नदी में मिलता है. लेकिन अमेरिका में तकनीक नहीं थी. तो मोती बनाना है तो जापान से मदद लेनी होती थी."

लेकिन शुरुआती दिनों में सीप के मुंह खोलने पर सोनकर ने व्हाइट सीमेंट के छोटे-छोटे टुकड़े डालकर अपना प्रयोग शुरू किया था. उन दिनों को याद करके सोनकर बताते हैं, "क्या बताएं, जब भी कोई मिलता था तो पूछता भइया बन गया मोती. तंज़ में लोग कहते भइया आजकल मोती उगा रहे हैं. माता-पिता कहते कि पगला गया है. लेकिन मुझे इनसे फ़र्क़ नहीं पड़ रहा था."

ये थकाने वाला नाउम्मीदी से भरा प्रयोग सोनकर ने केवल अपनी ज़िद पर कायम रखा और महज़ डेढ़ साल के अंदर उन्होंने फ़्रेश वॉटर के अंदर कृत्रिम मोती बनाकर दुनिया भर को अचंभे में डाल दिया, वह भी बिना जापानी मदद के.

यह पहला मौका था जब कृत्रिम मोती उगाने की दुनिया में जापान को चुनौती मिली थी. 1993 में हासिल इस कामयाबी ने रातों रात अजय सोनकर को सुर्ख़ियों में ला दिया. सोनकर के मुताबिक पहली बार सैकड़ों सीपों में से 36 में मोती बना था, परिवार वाले तो अचरज में थे, लेकिन मैं सोच में डूबा था कि बाक़ी में क्यों नहीं बना.


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