प्रयागराज से दुनिया को चौंकाने वाले सोनकर

 




डॉक्टर अजय सोनकर का नया काम भले अचंभे में डालने वाला हो, लेकिन मोती उगाने की दुनिया में बीते तीन दशक में वे इसी तरह के नये नये कामों से दुनिया को चौंकाते आए हैं. मोती बनाने को लेकर उनकी दिलचस्पी इलाहाबाद के कटरा में 1991 में शुरू हुई थी.

भौतिकी, रसायन और गणित पढ़ने वाले सोनकर इंजीनियर बनना चाहते थे और वारंगल रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज से उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई भी पूरी की. लेकिन उन्हीं दिनों दूरदर्शन पर दोपहर में आने वाले यूजीसी के शैक्षणिक कार्यक्रम पर आधारित टीवी शो के एक एपिसोड में प्रसारित एक स्टोरी ने उनके जीवन को बदल दिया.

उस एपिसोड के बारे में सोनकर बताते हैं, "उस स्टोरी में जापानी पर्ल कल्चर के बारे में बता रहे थे, जब मैंने सीप में से उन लोगों को मोती निकालते देखा तो फिर तो मेरी दिलचस्पी उसमें हो गई. इसकी वजह ये थी कि हमारे पास एक तालाब था और उसमें सीप थे. तो आप कह सकते हैं कि मेरे दिमाग़ में ये धंस गया कि मैं भी मोती बना सकता हूं, हालांकि मुझे तकनीक के बारे में कुछ भी मालूम नहीं था और इंटरनेट का तब जन्म ही हुआ था और भारत में वह मौजूद नहीं था."

डॉक्टर अजय कुमार सोनकर अपने शुरुआती दिनों के बारे में बताते हैं, "मैं जेब में सीप डालकर इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के जंतु विभाग के एक प्रोफ़ेसर साहब से पूछने चला गया कि सर ये क्या होता है तो उन्होंने कहा इसे मसल्स कहते हैं. मैंने पूछा कि सर ये खुलता कैसे है तो उन्होंने कहा पानी में उबालो. तब मैं ने कहा कि सर ये तो मर जाएगा, तो बोले और नहीं तो क्या, मरने के बाद ही इसे खोलते हैं, यूनिवर्सिटी में जितने सीप हैं सब मरे हुए ही हैं."

अजय कुमार सोनकर को अंदाज़ा तो हो गया था कि मोती उगाना इतना आसान नहीं है. लेकिन उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी. उन्होंने बताया, "इलाहाबाद के दरंभगा कॉलोनी के पास मत्स्य विभाग का कार्यालय था. वहां के निदेशक से डरते-डरते पूछा कि मेरे पास तालाब है और मैं मोती उगाना चाहता हूं, कोई मदद मिलेगी. उन्होंने मुझे ऊपर से नीचे देखा और कहा कि यहां तो हमलोग मछली उगा नहीं पा रहे हैं, तुम्हें मोती सूझ रहा है. पढ़ो लिखो, पढ़ने-लिखने की उम्र है तु्म्हारी. मोती फ़्रेश वॉटर में नहीं होता है, किसी दिन समुद्र ले आओ मेरे पास तो फिर देखा जाएगा.

लेकिन सोनकर ने हार नहीं मानी. कल्चर मोती बनाने की जानकारी जुटाने की कवायद शुरू हुई. लेकिन तब की दुनिया में सूचनाओं को हासिल करने का कोई आसान तरीका उपलब्ध नहीं था. लेकिन कहते हैं कि लगन सच्ची हो तो फिर रास्ता बनने लगता है.

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