पेरिस समझौते में भारत का वादा, कितना हुआ पूरा




पेरिस समझौते के बाद भारत ने भी अपनी तरफ़ से जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कई वादे किए थे जिसमें तीन प्रमुख बातें थीं.

पहला - 2005 के मुकाबले 2030 तक कार्बन उत्सर्जन में 33 से 35 प्रतिशत की कमी का लक्ष्य सबसे अहम था.

भारत सरकार का दावा है कि पहले लक्ष्य में 28 फ़ीसदी का टारगेट भारत 2021 में पूरा कर चुका है.

लेकिन भारत दुनिया में चीन और अमेरिका के बाद कार्बन उत्सर्जन करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश है. भारत अभी भी दुनिया में कोयले का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है और देश की कुल बिजली का 70% से ज़्यादा हिस्सा कोयले से ही उत्पादित होता है.

विकासशील देश होने की वजह से इस बात की संभावना है कि देश के सतत आर्थिक विकास के लिए अगले कुछ दशकों तक ऊर्जा के उत्पादन का मुख्य स्रोत कोयला ही रहेगा. माना जा रहा है कि ये एक महत्वपूर्ण तथ्य है जिस वजह से भारत ने अभी तक नेट ज़ीरो लक्ष्य की घोषणा नहीं की है.

पेरिस समझौते के बाद भारत का दूसरा बड़ा वादा था- 2030 तक अपनी बिजली आपूर्ति का 40 फ़ीसदी हिस्सा रिन्यूएबल (अक्षय) और परमाणु ऊर्जा से हासिल करना.

भारत सरकार का दावा है कि 2030 तक वो टारगेट से ज़्यादा (तक़रीबन 48 फ़ीसदी) हासिल कर लेगी.

पेरिस समझौते में तीसरा बड़ा वादा भारत सरकार ने पेड़ लगाने का किया था. भारत सरकार का लक्ष्य था कि 2030 तक इतने पेड़ लगाए जाएं ताकि वातावरण से अतिरिक्त 2.5 से 3 बिलियन टन कार्बन डाईऑक्साइड गैस सोखी जा सके.

केंद्र सरकार के आँकड़ों के मुताबिक़ 2001 से 2019 के बीच भारत का फ़ॉरेस्ट कवर 5.2 प्रतिशत बढ़ा है. लेकिन अंतरराष्ट्रीय संस्था ग्लोबल फ़ॉरेस्ट वॉच से ये आँकड़े मेल नहीं खाते. ग्लोबल फ़ॉरेस्ट वॉच के मुताबिक़ भारत में फ़ॉरेस्ट कवर घटा है.

दोनों के आँकड़े अलग-अलग होने की एक बड़ी वजह 'फ़ॉरेस्ट कवर' की परिभाषा में अंतर भी है.

ग्लासगो में भारत क्या कर सकता है?

ग्लासगो में जानकारों को उम्मीद है कि भारत अपने लक्ष्यों को संशोधित करने का एलान कर सकता है. इससे पहले भारत सरकार ने 'नेट-ज़ीरो' पर बहुत भरोसा नहीं जताया है.

चंद्र भूषण का कहना है, "भारत को इस सम्मेलन में एक लीडर के तौर पर जाना चाहिए, फ़ॉलोअर की तरह नहीं."

"नेट ज़ीरो इमिशन का टारगेट भारत के फ़ायदे में है. भारत 2050 से 2060 के बीच यह हासिल कर सकता है. अगर दुनिया का तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा नहीं बढ़ेगा तो सबसे ज़्यादा फ़ायदे में भारत ही होगा.

जल्द ही भारत की जनसंख्या 150 करोड़ होने वाली है. उसी अनुपात में ग़रीबों की संख्या भी बढ़ेगी, जो पहले से ही यहाँ ज़्यादा हैं. ग़रीबी का सीधा संबंध जलवायु परिवर्तन से है. ग़रीबों के पास रहने को पक्के मकान नहीं होते तो जलवायु परिवर्तन उन्हीं को सबसे ज़्यादा प्रभावित करता है.

इससे देश की जीडीपी भी फिर प्रभावित होती है. भारत में मॉनसून पर निर्भरता भी बहुत ज़्यादा है."

सीएसई की निदेशक सुनीता नारायण कहती हैं, "नेट ज़ीरो पर भारत सरकार क्या कहती है, इसके लिए हमें कुछ और वक़्त इंतज़ार करना होगा. लेकिन मेरा मानना है कि भारत सरकार कहेगी कि हमें 'नेट ज़ीरो' के पहले साल 2030 की तरफ़ ध्यान देने की ज़रूरत है."

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