लिव-इन रिलेशनशिप कब क़ानून की नज़र में सही हैं?
लिव-इन रिलेशनशिप, यानी शादी किए बगैर लंबे समय तक एक घर में साथ रहने पर बार-बार सवाल उठते रहे हैं. किसी की नज़र में ये मूलभूत अधिकारों और निजी ज़िंदगी का मामला है, तो कुछ इसे सामाजिक और नैतिक मूल्यों के पैमाने पर तौलते हैं.
एक ताज़ा मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे दो व्यस्क जोड़ों की पुलिस सुरक्षा की मांग को जायज़ ठहराते हुए कहा है कि ये "संविधान के आर्टिकल 21 के तहत दिए राइट टू लाइफ़" की श्रेणी में आता है.
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से कहा था कि दो साल से अपने पार्टनर के साथ अपनी मर्ज़ी से रहने के बावजूद, उनके परिवार उनकी ज़िंदगी में दखलअंदाज़ी कर रहे हैं और पुलिस उनकी मदद की अपील को सुन नहीं रही है.
कोर्ट ने अपने फ़ैसले में साफ़ किया कि, "लिव-इन रिलेशनशिप को पर्सनल ऑटोनोमी (व्यक्तिगत स्वायत्तता) के चश्मे से देखने की ज़रूरत है, ना कि सामाजिक नैतिकता की धारणाओं से."
भारत की संसद ने लिव-इन रिलेशनशिप पर कोई क़ानून तो नहीं बनाया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसलों के ज़रिए ऐसे रिश्तों के क़ानूनी दर्जे को साफ़ किया है.
इसके बावजूद इस तरह के मामलों में अलग-अलग अदालतों ने अलग-अलग रुख़ अपनाया है और कई फ़ैसलों में लिव-इन रिलेशनशिप को "अनैतिक" और "ग़ैर-क़ानूनी" करार देकर पुलिस सुरक्षा जैसी मदद की याचिका को बर्खास्त किया है.
कानून की नज़र में सही कब?
पंद्रह साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने साल 2006 के एक केस में फ़ैसला देते हुए कहा था कि, "वयस्क होने के बाद व्यक्ति किसी के साथ रहने या शादी करने के लिए आज़ाद है."
इस फ़ैसले के साथ लिव-इन रिलेशनशिप को क़ानूनी मान्यता मिल गई. अदालत ने कहा था कि कुछ लोगों की नज़र में 'अनैतिक' माने जाने के बावजूद ऐसे रिश्ते में रहना कोई 'अपराध नहीं है'.
सुप्रीम कोर्ट ने अपने इसी फ़ैसले का हवाला साल 2010 में अभिनेत्री खुशबू के 'प्री-मैरिटल सेक्स' और 'लिव-इन रिलेशनशिप' के संदर्भ और समर्थन में दिए बयान के मामले में दिया था.
खुशबू के बयान के बाद उनके ख़िलाफ़ दायर हुईं 23 आपराधिक शिकायतों को बर्खास्त करते हुए कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा था, "इसमें कोई शक नहीं कि भारत के सामाजिक ढांचे में शादी अहम है, लेकिन कुछ लोग इससे इत्तेफाक नहीं रखते और प्री-मैरिटल सेक्स को सही मानते हैं... आपराधिक क़ानून का मकसद ये नहीं है कि लोगों को उनके अलोकप्रिय विचार व्यक्त करने पर सज़ा दे."
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