धरती पर पानी क्या ख़त्म हो रहा है?- दुनिया जहान



कुछ महीनों पहले की बात है. ईरान में अभूतपूर्व सूखे और बारिश की कमी की वजह से नदियाँ सूख गईं. पूरे देश में पानी की कमी को लेकर भीषण विरोध प्रदर्शन हुए.

साल 2019 में भारत के सबसे बड़े शहरों में से एक चेन्नई का पानी संकट अख़बारों की सुर्खियां बना. उस वक़्त बहस छिड़ी कि बढ़े उद्योग, शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन का असर किस तरह का कहर बरपा सकता है.

साल 2018 में भीषण सूखे की वजह से दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन शहर में प्रति व्यक्ति रोज़ाना पचास लीटर पानी सप्लाई की सीमा लागू की गई.

साल 2014 में ब्राज़ील के साओ पाओलो और ऑस्ट्रेलिया के पर्थ में भी हालात कुछ ऐसे ही थे.

लंबे वक़्त से जल संकट के लिए ख़राब प्रबंधन, जलस्रोतों में निवेश की कमी और जलवायु परिवर्तन को ज़िम्मेदार ठहराया जाता रहा है. लेकिन न तो ये समस्या नई है और न ही कारण.

1980 के दशक से दुनिया में पानी के इस्तेमाल की दर प्रतिवर्ष लगभग एक फीसदी बढ़ रही है और 2050 तक इसके इसी दर से बढ़ते रहने की उम्मीद है.

जानकार मानते हैं कि आने वाले वक़्त में पानी की मांग और जलवायु परिवर्तन का असर बढ़ने से जलस्रोतों पर दबाव और बढ़ेगा.

तो इस सप्ताह दुनिया जहान में हमारा सवाल है कि क्या धरती से पानी ख़त्म हो रहा है. हम ये जानने की कोशिश करेंगे कि इस मुश्किल का हल कैसे हो सकता है.

एक तरफ सूखा, तो एक तरफ बाढ़

जेम्स फैम्लिएटी सास्काचेवान यूनिवर्सिटी में ग्लोबल इंस्टीट्यूट फ़ॉर वाटर सिक्योरिटी के कार्यकारी निदेशक हैं. इससे पहले वो कैलिफोर्निया में नासा में वॉटर साइंटिस्ट रह चुके हैं.

कैलिफोर्निया के जंगलों में हर साल आग लगती है. लेकिन चौंकाने वाली बात ये है सब्ज़ियों और फलों के मामले में देश की ज़रूरत का एक तिहाई हिस्सा यहां उगाया जाता है.

जेम्स कहते हैं, "अगर हम खेती के लिए पानी की बात करें तो शायद दुनिया के सभी खेती वाले इलाक़ों की स्थिति कैलिफोर्निया जैसी होगी. वहां जो उगाया जाता है वो केवल वहां की ही नहीं बल्कि दूसरे इलाक़ों की ज़रूरतों को भी पूरा करता है. जबकि दूसरे इलाक़े खेती के लिए पानी की यहां की ज़रूरतों को पूरा नहीं करते. ये अन्सस्टेनबल तरीका है."

साल 2002 में नासा ने ख़ास ग्रेस मिशन लॉन्च किया.

15 साल चले इस मिशन में सैटेलाइट तस्वीरों के ज़रिए धरती पर जलस्रोतों की स्थिति और जल के वितरण को समझने की कोशिश की गई.

जेम्स कहते हैं, "ग्रेस मिशन से हमें धरती के दोनों गोलार्ध में एक वैश्विक पैटर्न का पता चला. दुनिया के वो हिस्से जहां पानी भरपूर मात्रा में हैं उन्हें और पानी मिल रहा है जबकि दूसरे हिस्से सूखते जा रहे हैं. इस पैटर्न से दिखता है कि पानी वाले इलाक़ों में बार-बार बाढ़ आ रही है तो सूखे इलाक़ों में सूखा पड़ रहा है."

वैश्विक स्तर पर पानी के भंडारों के लगातार सूखते जाने में ग्लोवल वार्मिंग और खेती की भूमिका अहम है. लेकिन इसके दूसरे कारण भी हैं.


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