अलयत्मा की आज़ादी क्या सऊदी अरब की कमर तोड़ देगी?


अल-जौफ के बाहरी इलाके में अल-यत्मा के और युद्ध के सऊदी क्षेत्र की गहराई तक हस्तांतरण के बाद, नजरान के वह विशाल तेल भंडार जो यमन की सम्पत्ती थे और सऊदी अरब द्वारा वर्षों से लूटे जा रहे थे अब यमनी सेना के हाथ में आ गए है।

पर्यवेक्षकों का मानना है कि सऊदी सरकार हमेशा यमन के युद्धक्षेत्र में हार के बाद किसी खास मुद्दे को उठाकर या फिर मीडिया में झूठी खबरें चलाकर उसकी भरपाई करने की कोशिश करती है।

हालांकि पर्यवेक्षकों ने जोर देकर कहा कि सऊदी अरब को इन नकली और मीडिया हमलों से कोई फायदा नहीं होगा।

पर्यवेक्षकों का कहना है कि हमलावर गठबंधन के प्रवक्ता तुर्की अल-मलिकी के झूठे बयान अब किसी बच्चे को भी धोखा नहीं दे सकते। वह इन आरोपों से सऊदी जनमत को प्रभावित करना चाहते थे, क्योंकि जनता की राय यह है कि सऊदी अरब को यमन में भारी हार का सामना करना पड़ा है। इसलिए, इस देश की सरकार आंतरिक दमन के माध्यम से अपनी हार के परिणामों को रोकने की कोशिश कर रही है।

पर्यवेक्षकों ने कहा कि यमन में सऊदी अरब की हार स्पष्ट है हालांकि सरकार इसे एक जीत के रूप में देखने की कोशिश कर रही है, जबकि सऊदी नागरिक रोज़ाना उनके सरों पर गिरती यमनी बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन और हताहत सऊदी सैनिको को दफन होते हुए देख रहे हैं।

पर्यवेक्षकों ने सना बलों द्वारा अलयत्मा क्षेत्र पर कब्ज़े पर इशारा करते हुए कहाः रियाद पिछले 60 वर्षों से इस क्षेत्र को अपनी रेड लाइन मानते आया है, क्योंकि इस क्षेत्र में तेल के विशाल भंडार हैं और सऊदी अरब ने इस क्षेत्र से यमन को वर्षों से तेल निकालने की अनुमति नहीं है। अब इसके पतन से सना इस क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर सकती है।

पर्यवेक्षकों के अनुसार, मारिब की लड़ाई भी समीकरण तेज़ी से बदल रहे हैं, और अगर मीडिया इसे कवर करता है, तो उत्तरी यमन की लड़ाई में अपनी नवीनतम हार के कारण सऊदी सरकार गिरने का खतरा पैदा हो जाएगा।

कुछ यमनी अधिकारियों का कहना है कि नजरान पर नज़र रखने वाले अलयत्मा की आज़ादी के बाद भी यमनी सेना सऊदी अरब से लगती सीमा पर आगे बढ़ रह हैं।

अधिकारियों ने जोर देकर कहा कि सऊदी शासन यमन में दलदल में फंस कर गया है और उसके लिए बाहर निकलना मुश्किल है, इसलिए वह बहाने और दावों का करता है कि ईरान यमन में हस्तक्षेप कर रहा है और भी दूसरे कई पक्ष हैं तो सेना और अंसारुल्लाह का समर्थन कर रहे हैं।

विश्लेषकों का मानना है कि यह वही सऊदी जो युद्ध के आरंभिक दिनों में लगातार बढ़ाचढ़ाकर यह पेश कर रहा था कि सऊदी अरब कुछ ही दिनॉं में यमन को धूल चटा देगा।

विश्लेषकों का कहना है कि यमन पर सऊदी आक्रमण के परिणाम सभी के लिए स्पष्ट हो गए हैं। जैसे ही मुहम्मद बिन सलमान सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस बने, उन्होंने बिन सोचे समझे यह युद्ध शुरू कर दिया। यह शुरू से ही स्पष्ट था कि उन्हें हार का सामना करना पड़ेगा। सऊदी अरब अभी भी अपने मीडिया में युद्ध के शुरुआती की तरह उन्हीं विशेषज्ञों का उपयोग कर रहा है, और निश्चित रूप से उनके बयान घरेलू जनमत के लिए हैं - दुनिया के लिए नहीं - । उनकी यह नीति कितनी खोखली है इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि जब आक्रामक बलों के प्रवक्ता ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में यमनियों के खिलाफ झूठे आरोप लगाए तो पश्चिमी मीडिया ने उनको कवर करने के बजाए चुप्पी साधे रखी, यह बताता है कि पश्चिमी मीडिया को भी सऊदी अरब के दावों पर भरोसा नहीं है।

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