उत्तर प्रदेश चुनाव: 2007 की यादें और सोशल इंजीनियरिंग के दम पर बसपा की छुपा रुस्तम साबित होने की उम्मीद कितनी कारगर होगी?




पिछले साल 9 अक्टूबर को पार्टी संस्थापक कांशीराम की पुण्यतिथि पर बहुजन समाज पार्टी ने लखनऊ में एक बड़ी जन सभा की.

इस सभा में भाषण देते हुए बसपा सुप्रीमो मायावती ने कहा कि उत्तर प्रदेश की जनता समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी से दुखी रही है और अब बसपा के शासन काल को याद कर रही है. साथ ही मायावती ने दावा किया कि जनता सत्ता परिवर्तन के लिए अपना मन बना चुकी है और इस बार उनकी पार्टी की सरकार बनना तय है.

इस जनसभा के बाद कई हफ़्तों तक मायावती किसी बड़े चुनावी आयोजन में नज़र नहीं आईं और ये चर्चा ज़ोर पकड़ने लगी कि मायावती चुनाव प्रचार से नदारद क्यों हैं?

कुछ दिन पहले जब बीबीसी की टीम लखनऊ में बसपा के मुख्यालय पहुंची तो वहां सन्नाटा पसरा था. तीन चार पार्टी कर्मचारियों के सिवा वहां कोई नहीं था. पार्टी मुख्यालय को देख कर ये कहना मुश्किल था कि ये एक ऐसी राजनीतिक पार्टी का दफ्तर है जो उत्तर प्रदेश में अगली सरकार बनाने का दावा कर रही है.


लेकिन बहुजन समाज पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा का ये कहना था कि ज़मीनी स्तर पर उनकी पार्टी का चुनाव प्रचार उसके प्रतिद्वंद्वियों से मीलों आगे है.

बसपा के गढ़ में माहौल

इसी दावे की जांच करने के लिए हम आगरा के राजनगर इलाके में पहुंचे.

आगरा में एक बड़ी दलित आबादी बसती है और इसीलिए इसे भारत की दलित राजधानी भी कहा जाता है. राजनगर चमड़ा उद्योग का केंद्र है और यहाँ जाटव समुदाय का बाहुल्य है. वही जाटव समुदाय जिसे बहुजन समाज पार्टी के कोर वोटर के तौर पर गिना जाता है.

इस इलाके के लोगों का मन टटोलने हम जूता बनाने की एक दो कमरों की इकाई में गए.

इस उद्योग के मालिक गुरुदेव गौतम का कहना था कि कोविड महामारी की वजह से उनका व्यवसाय बुरी तरह प्रभावित हुआ और प्रदेश की सरकार ने उन जैसे लोगों की कोई सुध नहीं ली.

उन्होंने कहा, "लॉकडाउन लगने से हमारी हालत इतनी खस्ता हो गई कि हम जो रोज़ सौ या सवा सौ जोड़ियां बनाते थे, आज पचास जोड़ियां भी नहीं बनती हमारे यहाँ. खाने के लिए परेशान हैं. मज़दूर चले गए छोड़-छोड़ कर. क्या करें? हमारे पास पैसा नहीं है. सरकार हमें पैसा नहीं देती है. कारोबार करने के लिए. लोन मिलता नहीं है, दलाल बैठे हुए हैं वहां पर."

गुरुदेव गौतम ने अपनी सारी उम्मीदें इस बात पर टिका रखी हैं कि प्रदेश में फिर एक बार मायावती की सरकार बनेगी. वे कहते हैं, "2007 में बहनजी जीत के आईं और बसपा की सरकार बनी. उन्होंने जूता उद्योग के लिए ही नहीं बल्कि सबके लिए किया अच्छा काम किया. उन्होंने भेद-भाव नहीं रखा. उनके लिए एक ही विचार था कि सब समान हैं."

ऐसा मानने वाले गुरुदेव गौतम अकेले नहीं हैं. राजनगर में हमें दर्जनों ऐसे लोग मिले जो 2007 में बनी बसपा सरकार की तुलना 2012 में बनी समाजवादी पार्टी की सरकार और 2017 में बनी भारतीय जनता पार्टी की सरकार से करते दिखे.

राजनगर में रहने वाली महिलाओं का कहना था कि पिछले कुछ सालों में असुरक्षा की भावना बढ़ी है और सिर्फ़ मायावती की सरकार ही इस बड़ी समस्या का हल कर सकती है.

राज नगर में रहने वाली गीता देवी ने मंहगाई और बेरोज़गारी के साथ-साथ महिला सुरक्षा की बात उठाई. उन्होंने कहा, "बहनजी के समय में इतनी सुरक्षा थी कि रात-बे-रात कहीं भी जाते थे तो सुरक्षित पहुँच जाते थे. अब तो छह बज जाएं तो लगता है कि कहीं से बदमाश न आ जाएं. तो दिल में डर ही है. हम तो चाहते हैं कि बहनजी की ही सरकार बने."

बहुजन समाज पार्टी के कार्यकर्ता अनिल सोनी का कहना है कि पार्टी से जुड़े लोगों ने एक-एक घर जाकर प्रचार किया है. वे कहते हैं, "हम लोग पैरों से चलकर मतदाताओं तक पहुंचे. हम एक नहीं सभी जातियों तक पहुंचे. ब्राह्मण से लेकर वाल्मीकि तक एक-एक घर हमारे प्रत्याशी गए. प्रत्याशियों की घोषणा माननीय बहनजी ने चार महीने पहले ही कर दी थी. हमारा होम-वर्क पूरा तैयार है, अब तो बस एग्ज़ाम की तैयारी है और हम तैयार बैठे हैं."

अनिल सोनी का कहना है कि कोविड महामारी के दौरान लोगों ने जो तकलीफ़ें झेलीं उनका असर इन चुनावों में दिखेगा. वे कहते है, "जो आदमी एक हज़ार किलोमीटर पैदल चला है, क्या वो अपने पैरों के छालों को भूल गया है? लोगों को ऑक्सीजन के सिलिंडर नहीं मिल पाए, दवाएं नहीं मिल पाईं, राशन नहीं मिल पाया, रोज़गार नहीं मिल पाया. क्या लोग भूल जायेंगे? नहीं भूलेंगे. अपने दर्द को नहीं भूल पाता आदमी."


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