क्या बसपा को ब्राह्मणों का समर्थन मिलेगा?




प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद दिल्ली यूनिवर्सिटी में हिंदी विभाग में कार्यरत हैं और एक जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक और स्तंभकार हैं. उनके मुताबिक़ 2007 के समीकरण को दोहराना बहुजन समाज पार्टी के लिए मुश्किल होगा.

वो कहते हैं, "ब्राह्मणों को अगर आप वर्णवादी दृष्टि से देखें तो भारतीय जनता पार्टी के रूप में उन्हें एक विचारधारात्मक पार्टी मिली है जिसे आसानी से छोड़ना उनके लिए संभव नहीं होगा."

प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद कहते हैं, ''ये कहा जा रहा है कि योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने से जो राजपूतों और ब्राह्मणों में एक प्रतिद्वंद्विता उभरी है उससे ब्राह्मण शायद अपनी वफ़ादारी बदल लेंगे. लेकिन अगर वे बदलेंगे भी तो वे ऐसे दल की तरफ़ जाएंगे जिससे सत्ता में उनकी भागीदारी और बन सके और वो मोल-तोल करने की ताक़त रख सकें. अभी के माहौल में बहुजन समाज पार्टी का जो जनाधार है वो किसी भी दूसरे जातीय समूह को विश्वास नहीं दिलाएगा कि वो सत्ता में आ पाएगा. इसलिए मुझे नहीं लगता कि ये समीकरण दोहराया जा सकेगा."

प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद के मुताबिक़ अगर बसपा की चुनाव जीतने की सारी अपेक्षा और रणनीति ब्राह्मणों का वोट अपनी तरफ़ खींच लेने पर निर्भर है तो "ये एक थकी हुई और आलसी रणनीति है".

वो कहते हैं, "2007 से 2022 के बीच काफ़ी कुछ बदल चुका है. क्या ब्राह्मण भी इस तरह से सोच रहे हैं और क्या एक ही तरफ़ जाएंगे? और हिंदुत्व की पूरी परियोजना में ब्राह्मणों ने अपने आप को किस तरफ़ खड़ा किया है, ये भी एक प्रश्न है. अगर बसपा उसी पुराने फ़ॉर्मूले पर काम करेगी तो ब्राह्मण भी अब वो नहीं है, ब्राह्मण भी बदला है. इस बीच जो उग्र हिंदुत्व की राजनीति का हस्तक्षेप उत्तर प्रदेश की राजनीति में हुआ है, उसने उच्च जातियों को किस तरह बदला है, इसकी पूरी समझ अभी हमारे पास नहीं है."

प्रबुद्ध सम्मेलनों का असर?

बहुजन समाज पार्टी ने पिछले कई महीनों में ब्राह्मणों को लुभाने के लिए राज्य में कई प्रबुद्ध सम्मलेन किए. क्या इन सम्मेलनों से पार्टी को कोई चुनावी फ़ायदा होगा?

प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद कहते हैं, "ये सब तो प्रतीकात्मक कार्यक्रम हैं सन्देश देने के लिए. हम देखते हैं कि उत्तर प्रदेश सरकार में ब्राह्मण-ठाकुर विवाद की बात होती है. तो हर दल उसी पर काम करने की कोशिश करता है और समझता है कि अगर उसने ब्राह्मणों को अपनी तरफ़ कर लिया तो बाज़ी जीत ली. मुझे नहीं लगता है कि ये काम करेगा."

वो कहते हैं कि चुनाव परिणाम काफ़ी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि पिछड़ी और अति-पिछड़ी जातियों का कैसा गठजोड़ बनता है. "जब तक सामाजिक समूहों में एक बड़ा गठजोड़ नहीं बनता है तब तक चुनावी जीत हासिल करने की बात कहना कठिन है. और ऐसा नहीं दिख रहा है कि बहुजन समाज पार्टी की तरफ़ से ऐसा कुछ करने की कोशिश हो रही है. अगर भारतीय जनता पार्टी के साथ सामाजिक समूहों को जोड़ने की प्रतियोगिता है तो उसमें समाजवादी पार्टी ही नज़र आ रही है."

प्रोफ़ेसर रवि कांत चन्दन लखनऊ यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग में कार्यरत हैं और दलित राजनीति के जानकार हैं.

वो कहते हैं, "अयोध्या में जो पार्टी ने प्रबुद्ध सम्मलेन किया उसमें पहली बार ये हुआ की बसपा के मंच से जय भीम की जगह जय श्री राम के नारे लगे. उससे ये लगा कि मायावती ने अपनी पूरी विचारधारा को सिर के बल खड़ा कर दिया है. लेकिन ये वास्तव में उनकी रणनीति का हिस्सा है. उनको ऐसा लगता है कि योगी आदित्यनाथ की सरकार में जो ब्राह्मणों की अवहेलना हुई है उस वजह से वो फिर से बीएसपी के साथ जा सकता है."

बसपा कमज़ोर नहीं'

प्रोफ़ेसर रवि कांत के मुताबिक समाजवादी पार्टी का एक इतिहास रहा है जिसमें यादवों और मुसलमानों का हावी हो जाना देखा गया है और इसी वजह से ब्राह्मण समुदाय बीएसपी के साथ जा सकता है.

वे कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी ने इस चुनाव् को केवल दो पार्टियों की लड़ाई के तौर पर पेश किया है और ऐसा दिखाया है कि उसकी लड़ाई केवल सपा से है. "भाजपा की ये कोशिश है कि जो अगड़ी जातियां हैं उनको विकल्पहीन बना दिया जाए. ब्राह्मण नाराज़ हैं और ठाकुर भी बहुत ख़ुश नहीं हैं. इसमें कोई शक़ नहीं कि ठाकुरों को प्रशासन में बहुत जगह मिली या उनके माफ़िया को संरक्षण मिला लेकिन आम ठाकुर को कुछ हासिल नहीं हुआ. तो जो सरकार से नाराज़ अगड़ी जातियों के लोग हैं वो सपा में जा नहीं सकते क्योंकि उन्हें हिचक है कि यादवों की गुंडई शुरू हो जाएगी या मुसलमानों को सरकार से संरक्षण मिलेगा."

प्रोफ़ेसर रवि कांत के मुताबिक मायावती की ख़ामोशी रणनीतिक है क्योंकि वो अगड़ी जातियों को कोई ग़लत सन्देश नहीं देना चाहती हैं.

वो कहते हैं, "जैसे-जैसे चुनाव आगे बढ़ रहा है, बीएसपी मज़बूत होती दिख रही है. पिछले कुछ हफ़्तों में बहुत तब्दीली आई है. जिस तरह से बीएसपी को कमज़ोर समझा जा रहा था, वैसी कमज़ोर वो है नहीं. उनकी रणनीति ये है कि जैसे-जैसे ये चुनाव केवल दो पार्टियों के बीच होता दिखेगा और बीएसपी थोड़ी सी मज़बूत दिखेगी तो अगड़ी जातियों का वोट ख़ासकर ब्राह्मणों का बीएसपी की तरफ़ जा सकता है. उनमें जो आत्मविश्वास है वो इसी वजह से है कि जो समीकरण बनेंगे तो ब्राह्मण बीएसपी की तरफ़ जाएंगे. लेकिन ऐसा हो पायेगा या नहीं उस पर मुझे थोड़ा संदेह है."

वो कहते हैं कि भाजपा के लिए सपा के ख़िलाफ़ ध्रुवीकरण करना आसान है और भाजपा यही चाहती है कि बसपा लड़ाई में कहीं दिखाई न दे. "लेकिन बसपा को क़तई कमज़ोर नहीं आंका जा सकता."

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