यूक्रेन से लौटे मेडिकल छात्रों के भविष्य को लेकर चिंता, क्या देश में पूरी कर पाएंगे पढ़ाई
हरियाणा में हिसार के रहने मास्टर सुल्तान पेशे से किसान हैं. 2019 में घर के गहने गिरवी रखकर उन्होंने अपने बेटे कुलदीप का एडमिशन यूक्रेन की एक मेडिकल यूनिवर्सिटी में कराया था.
पिता का सपना बेटे को डॉक्टर बनाना था. लेकिन अब ना सिर्फ मास्टर सुल्तान बल्कि उनके जैसे हज़ारों परिवारों के सपनों पर संकट के बादल छा गए हैं. वजह है यूक्रेन में रूस का हमला. इस कारण हज़ारों छात्रों को मेडिकल की पढ़ाई बीच में ही छोड़कर भारत लौटना पड़ रहा है.
कुलदीप डेनीप्रो स्टेट मेडिकल यूनिवर्सिटी में थर्ड ईयर के छात्र हैं. उन्होंने बीबीसी से कहा, "तीन साल में अब तक बीस लाख रुपये खर्च हो चुके हैं. छठा सेमेस्टर फरवरी में शुरू हुआ था, फीस भी भर दी थी लेकिन हालात ऐसे थे कि भारत लौटना पड़ा. यूक्रेन में अब जैसे हालात हैं मुझे नहीं लग रहा कि हम कभी वापिस जा पाएंगे. मैं अपने करियर के बारे में कुछ नहीं सोच पा रहा हूं कि अब कैसे मेरी पढ़ाई पूरी होगी, कैसे मैं डॉक्टर बन पाऊंगा."
कुलदीप को यूक्रेन में मेडिकल की पढ़ाई के लिए भेजना परिवार के लिए भी आसान नहीं था. कुलदीप के पिता सुल्तान बताते हैं, "गहने बैंक में रखकर लोन लिया, किसान क्रेडिट कार्ड से पैसे उठाए तब जाकर बच्चे की फीस भरी. कपास की फसल भी कम हो रही है. एक-एक रुपये की परेशानी झेलकर बच्चे को डॉक्टर बनने के लिए भेजा था."
कुलदीप जैसे क़रीब 18 हज़ार बच्चे हैं जो यूक्रेन छोड़कर मजबूरन भारत आ रहे हैं. किसी ने दो साल की पढ़ाई पूरी की है तो किसी ने चार साल की. सब बच्चों के सामने बस एक ही सवाल है कि अब उनकी आगे की पढ़ाई कैसे पूरी होगी? क्या उन्हें भारत में कहीं जगह मिल पाएगी? या फिर उन्हें यूक्रेन में हालात ठीक होने का इंतजार करना होगा?
इस मामले को लेकर राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग यानी नेशनल मेडिकल कमीशन ने एक बयान जारी कर यूक्रेन से लौटे भारतीय छात्रों को एक साल का बाध्यकारी इंटरनशिप भारत में ही पूरा करने की इजाज़त दे दी है. हालांकि इसके लिए उन्हें फ़ॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट एग्ज़ामिनेशन की परीक्षा पास करनी होगी.
बयान में आयोग ने कहा कि फ़ॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट लाइसेंस रेगुलेशन 2021 लागू करने के बाद से कुछ छात्रों को स्टेट मेडिकल काउंसिल में पंजीकरण करवाने में परेशानी आ रही है, लेकिन स्टेट काउंसिल अब इन छात्रों की अर्जियां प्रोसेस कर सकते हैं.
बयान में कहा गया है कि अगर छात्र को 18 नवंबर 2021 से पहले फ़ॉरेन मेडिकल डिग्री या प्राइमरी क्वालिफ़िकेशन मिल गई है, या, अगर छात्र ने 18 नवंबर 2021 से पहले विदेशी संस्थान में मेडिकल की अंडरग्रेजुएट पढ़ाई के लिए दाखिला लिया था या फिर, जिन्हें केंद्र सरकार ने विशेष नोटिफिकेश के ज़रिए छूट दी है, उन पर फ़ॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट लाइसेंस रेगुलेशन 2021 लागू नहीं होगा.
सड़क परिवहन राज्य मंत्री जनरल वीके सिंह ने भारतीय छात्रों के लिए पोलैंड में पढ़ाई पूरी करने की बात कही है. पोलैंड में भारतीय छात्रों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, "अगर आपकी पढ़ाई पूरी नहीं हुई तो, पोलैंड के जितने भी लोगों से मिला हूं, वो कह रहे हैं कि हम जितने भी बच्चे यूक्रेन में थे उनकी पढ़ाई करवाने का जिम्मा लेते है."
तो, क्या भारतीय छात्रों का पोलैंड में जाकर पढ़ाई पूरा करना आसान है?
'योर चाणक्य, द करियर गुरु कंसल्टेंसी' के निदेशक रितेश के मुताबिक़ इसमें कुछ मुश्किलें हैं.
रितेश बताते हैं, "यूक्रेन के मुक़ाबले पोलैंड में मेडिकल की पढ़ाई महंगी है. यूक्रेन में क़रीब 25 लाख में मेडिकल की पूरी पढ़ाई हो जाती है वहीं पोलैंड में ये खर्चा 40 से 60 लाख रुपये तक का होता है. अगर पोलैंड की यूनिवर्सिटी इसकी इजाज़त भी देती हैं तो भी भारतीय छात्रों के लिए वहां जाकर मेडिकल की पढ़ाई पूरी करना मुश्किल होगा."
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